मेंटर शब्द की जड़: ओडिसी से दफ़्तर तक
कल रात मैंने क्रिस्टोफ़र नोलन की ओडिसी देखी। जिस दृश्य में मेंटर का किरदार मरता है, वहाँ मेरा ध्यान परदे से हटकर कहीं और चला गया।
जिस कंपनी में मैं काम करता हूँ, वहाँ एक मेंटर प्रोग्राम है। कोई नया व्यक्ति कंपनी में आता है तो उसे एक मेंटर सौंपा जाता है। वह व्यक्ति नए साथी को ऑनबोर्डिंग से गुज़ारता है और ख़ास तौर पर शुरुआती महीनों में उसे काम का वह हिस्सा समझाता है जो कहीं लिखा हुआ नहीं होता।
और वहीं, अंधेरे हॉल में, एक अजीब-सा सवाल मन में अटक गया। क्या यह शब्द सचमुच ओडिसी से आया है? क्या मेंटर का पहला इस्तेमाल इसी योद्धा किरदार के नाम में हुआ था? हमारी साइट के शब्द-मूल वाले खाने के लिए यह अच्छा विषय है।
घर लौटकर मैंने खोजा। जवाब हाँ निकला। पर दिलचस्प जवाब नहीं है — दिलचस्पी जवाब के पीछे पड़े ब्योरों में है।
ओडिसी में मेंटर लगभग कुछ नहीं बोलता
होमर के महाकाव्य में मेंटर ओडिसियस का पुराना मित्र है। ट्रॉय की लड़ाई पर निकलते हुए ओडिसियस अपना घर और अपना बेटा टेलीमेकस उसी के भरोसे छोड़ जाता है।
तर्क से आप यह उम्मीद करेंगे कि मेंटर पूरे महाकाव्य में मौजूद रहेगा, लड़के को सलाह देगा, लंबे भाषण देगा।
ऐसा होता नहीं।
जब मैंने देखा कि मूल पाठ में मेंटर के हिस्से में लगभग कोई संवाद आता ही नहीं, तो रुककर दोबारा पढ़ा। क्योंकि टेलीमेकस को असल में राह दिखाने वाली एथीना है। फ़िल्म में यह फ़र्क़ उतना साफ़ नहीं होता। देवी बीच-बीच में मेंटर का भेस धरकर आती है। आवाज़ मेंटर की, चेहरा मेंटर का, पर भीतर से बोलने वाली बुद्धि की देवी है।
यानी महाकाव्य का मेंटर दरअसल एक मुखौटा है। वह मार्गदर्शन करने वाला व्यक्ति नहीं, वह रूप है जो मार्गदर्शन धारण कर लेता है।
अट्ठाईस सौ साल बाद हमारी कंपनी के एचआर विभाग ने संयोग से यही शब्द चुन लिया। और शब्द का असली मालिक, वह किरदार, अपने ही महाकाव्य में एक बार भी ढंग से नहीं बोला।
होमर की दुनिया में नाम बोलते हैं
इसे समझने के लिए यह जानना पड़ता है कि प्राचीन यूनान नामों को किस नज़र से देखता था।
होमर की दुनिया में नाम कोई मनमाना लेबल नहीं है। नाम अपने भीतर यह लिए चलता है कि व्यक्ति कौन है और उसके साथ आगे क्या होने वाला है।
इस विचार के लिए पोर्टमैंटो शब्द वाली उपमा काम आती है। एक अलमारी की तरह सोचिए। बाहर से आपको एक ही शब्द दिखता है, पर खोलने पर भीतर तह किए हुए कई अर्थ निकलते हैं। किरदार का सार उसी एक शब्द के भीतर ठूँस दिया गया है।
लातीनी में इसके लिए एक कहावत है: nomen est omen। नाम ही भविष्यवाणी है।
मेंटर भी इसी क़िस्म का नाम है।
यह शब्द प्रोटो-इंडो-यूरोपियन जड़ *men- पर खड़ा है। अर्थ: सोचना, मनन करना। यूनानी में यह menos बनकर जीवित रहा — मन, प्राण, जीवन-शक्ति।
यानी मेंटर के नाम का सीधा अनुवाद है सोचने वाला आदमी, या अक्ल देने वाला।
होमर ने इस किरदार को मार्गदर्शक बनाया, उससे पहले ही उसके नाम ने उसे मार्गदर्शक घोषित कर रखा था। मंच पर आने की ज़रूरत भी नहीं थी।
एक ही जड़ के दो सिरे
एक बात और मिली, और सच कहूँ तो उस पर मैं थोड़ा चौंका।
*men- जड़ लातीनी में mens बनकर पहुँची, मन और बुद्धि के अर्थ में। यहीं से वह शब्द निकला जिसे आज हम सब जानते हैं: dementia। यानी de- (दूर होना) और mens (मन)।
मन से दूर हो जाना।
मेंटर और डिमेंशिया एक ही प्रागैतिहासिक ध्वनि से अलग हुए दो भाई हैं। एक में मन किसी को उपहार में दिया जाता है, दूसरे में मन हाथ से फिसल जाता है। एक ही जड़ से निकलकर दोनों ठीक उलटी दिशाओं में चल पड़े।
यह जड़ संस्कृत में भी जीती रही: मनस्। भारतीय दर्शन में मनस् विचार का कच्चा माल है — मन की वह परत जो लगातार चलती रहती है, छापें इकट्ठा करती रहती है। उपनिषदों में और बौद्ध मनोविज्ञान में वह हमेशा इसी जगह खड़ा मिलता है।
वही ध्वनि भूमध्य सागर के किनारे एक महाकाव्य के किरदार का नाम बनी, और दक्षिण एशिया में मानव चेतना का बुनियादी पद बन गई। दूरी हज़ारों किलोमीटर की है, पर जड़ एक ही है।
हिंदी में यह जड़ आज भी सतह पर पड़ी है। मन, मनन, मनःस्थिति — जिस तक पहुँचने के लिए यूनानी या लातीनी में शब्दकोश खोलना पड़ता है, वह यहाँ रोज़ की बोली है। एक ही ध्वनि एक तरफ़ किसी किरदार का नाम बनी, दूसरी तरफ़ इतनी आम हो गई कि उसका पुरानापन दिखना ही बंद हो गया।
कॉरपोरेट कंपनियों में मेंटरशिप है क्यों
अब असली सवाल पर आता हूँ। कंपनी का वह प्रोग्राम आख़िर है किसलिए।
नए आए व्यक्ति को आप दस्तावेज़ थमा सकते हैं। प्रोसेस मैप, टूल की सूची, ऑनबोर्डिंग विकी। सब लिखा हुआ है और सबकी पहुँच में है।
किस मीटिंग में जाना सचमुच मायने रखता है, किस व्यक्ति के पास किस ढंग से जाना चाहिए, कोई मेल कब भेजा जाए, किसी असहमति को किस लहजे में रखा जाए। यह कोई दस्तावेज़ नहीं बताता।
इस तरह के ज्ञान को मौन ज्ञान कहते हैं। हंगेरियन-ब्रिटिश वैज्ञानिक और दार्शनिक माइकल पोलानी की परिभाषा में: वह जो हम जानते हैं पर कह नहीं सकते।
ऐसे सोचिए। साइकिल चलाना जानने वाला क्या आपको वह लिखकर सिखा सकता है? संतुलन, पैडल, हैंडल — सब लिख भी दे तो उस लेख के सहारे आप साइकिल नहीं चला पाएँगे। ज्ञान शब्द में नहीं, शरीर में रहता है।
पोलानी का अपना उदाहरण और भी तीखा है। आप हज़ारों चेहरों में से एक चेहरा पहचान लेते हैं, पर यह नहीं बता सकते कि पहचाना कैसे। बताने बैठिए तो हाथ में कुछ सूखे विशेषण रह जाते हैं। जो चीज़ पहचानती है, वह वही नहीं है जिसका वर्णन आप कर सकते हैं।
कंपनियों के लिए भी लिखी हुई भाषा और बोली जाने वाली चेतना अलग चीज़ें हैं। जो कुछ जाना जाता है, वह सब लिखा नहीं जा सकता। और कुछ चीज़ें लिखे जाने के लायक़ ही नहीं होतीं। कंपनी जैसे जीवित, बदलते ढाँचे में हर चीज़ साँचे में नहीं ढाली जा सकती; ढाल भी दी जाए तो नया आदमी जब उन काग़ज़ों तक पहुँचता है, तब तक असल हालात कुछ और हो चुके होते हैं।
कॉरपोरेट ज़िंदगी का बड़ा हिस्सा इसी तरह चलता है। और जो ज्ञान लिखा नहीं जा सकता, उसके हस्तांतरण का एक ही रास्ता बचता है: किसी के पास खड़े रहना।
भारत में यह बात नई नहीं है, इसके लिए पूरी शब्दावली पहले से मौजूद है। गुरु-शिष्य परंपरा में शिष्य गुरु के पास सिर्फ़ पढ़ने नहीं, रहने जाता था। गुरुकुल का ढाँचा इसी एक धारणा पर टिका था कि कुछ चीज़ें सुनाई नहीं जातीं, साथ रहते-रहते उतरती हैं। यहाँ तक कि जिस ज्ञान को सबसे ऊँचा माना गया, उसका नाम ही श्रुति पड़ा — यानी जो सुना गया। सदियों तक वह काग़ज़ पर नहीं, कान से कान तक चला।
मेंटरशिप की संस्था इतनी पुरानी क्यों है, जवाब यहीं है। यह कोई प्रबंधन का फ़ैशन नहीं। यह इंसान की सबसे पुरानी हस्तांतरण-समस्या को दिया गया सबसे पुराना हल है।
एक नाम आम संज्ञा कैसे बन जाता है
इतिहास में ऐसे व्यक्तिवाचक नाम बहुत कम हैं जो आम संज्ञा बन जाएँ और इस उतार में अपनी क़ीमत न खोएँ।
लातीनी लिपि में यह बदलाव आँख से दिख भी जाता है, क्योंकि नाम बड़े अक्षर से शुरू होता था और अब छोटे अक्षर से लिखा जाता है। देवनागरी में वह फ़र्क़ नहीं दिखता, पर होता वही है। नाम किसी एक व्यक्ति का पता देना छोड़कर एक पूरी क़िस्म का पता देने लगता है।
नार्सिसस पुराकथा का किरदार था, नार्सिसिज़्म एक व्यक्तित्व-लक्षण का नाम बन गया। ओडिसी एक महाकाव्य का नाम था, अंग्रेज़ी में odyssey का मतलब लंबी और कठिन यात्रा है। मेंटर महाकाव्य की एक आकृति था, आज हर भाषा में एक ही तरह के रिश्ते का नाम है।
मैंने सोचा कि ये बदलाव होते क्यों हैं। जवाब शायद यह है।
धारणा शब्द से पहले होती है।
लोग यह रिश्ता हज़ारों साल से जी रहे थे। उस्ताद शागिर्द को गढ़ता था, बूढ़ा जवान को चेताता था, तजुर्बेकार नौसिखिए के पास खड़ा रहता था। पर इस रिश्ते का कोई तेज़, साफ़ नाम नहीं था।
होमर ने जब एक किरदार को वह नाम दिया, तो नाम एक ख़ाली पड़े ख़ाने में जाकर बैठ गया। इतना ठीक बैठा कि समय के साथ वह किरदार को नहीं, धारणा को बताने लगा।
इसे मुमकिन बनाने वाली चीज़ जड़ की पारदर्शिता थी। प्राचीन यूनानी इस नाम को सुनते ही जिसके पास मन है, जो अक्ल देता है — यह भाव अपने आप पकड़ लेता था।
अर्थ छिपा हुआ नहीं था, नाम ख़ुद उसका प्रतिनिधि था।
जो नाम अपने भीतर धारणा लिए चलता है, उसे देर-सबेर उसी धारणा में बदल जाना होता है।
क्रिस्टोफ़र नोलन की ओडिसी के एक किरदार का एक दृश्य यह सब सोचने की वजह बन गया…
विडंबना यहाँ है। महाकाव्य और फ़िल्म, दोनों का सबसे कम बोलने वाला किरदार आज हर दफ़्तर में इस्तेमाल होने वाले एक शब्द की बुनियाद है। शायद अच्छा मार्गदर्शन होता ही ऐसा है — बहुत बोलने वाला नहीं, पास खड़ा रहने वाला।
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स्रोत ख़ुद
ओडिसी
होमर; अनुवाद: रमेश चन्द्र सिन्हा
मेंटर इसी महाकाव्य में जन्मा और लगभग बिना बोले एक पूरी धारणा का नाम बन गया। लेख ख़त्म करके सीधे मूल पाठ तक जाना चाहें तो पहला पड़ाव यही है।
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