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पूर्व × पश्चिम

मौन: दादिर्री की भाषा और पश्चिम का शोर

समानांतर·28 जुलाई 2026·6 मिनट पढ़ें

एक आँकड़े से शुरू करते हैं, क्योंकि यह आँकड़ा थोड़ा डराता है। आज एक औसत पश्चिमी वयस्क अपने दिन के लगभग चार घंटे सिर्फ़ ऑडियो माध्यमों को देता है। पॉडकास्ट, संगीत, रेडियो, स्ट्रीमिंग सेवाएँ। नौजवानों में यह समय साढ़े चार घंटे पार कर जाता है। स्क्रीन को भी जोड़ लें, तो जागने के आधे से ज़्यादा घंटे किसी न किसी आवाज़ से भरे रहते हैं।

दूसरी तरफ़ दुनिया की सबसे पुरानी, बिना टूटे चली आ रही संस्कृति खड़ी है। पैंसठ हज़ार साल से वह मौन को एक भाषा की तरह बरतती है। वही मनुष्य, वही कान। एक के लिए मौन भरने वाला खालीपन है, दूसरे के लिए बोली जाने वाली भाषा।

मौन पहली नज़र में सीधी-सादी चीज़ लगता है। पर हम उसे क्या अर्थ देते हैं, यही हमारी संस्कृति का भेद खोल देता है। कोई समाज चुप्पी में सुकून देखता है या ख़तरा — अकेला यह सवाल बता देता है कि उस समाज का दुनिया से कैसा रिश्ता है।

यहाँ ऑस्ट्रेलिया के आदिवासी (ऐबोरिजिनल) समाजों की परंपरा और प्रबोधन के बाद के आधुनिक पश्चिम को साथ-साथ रखकर देखा गया है।

जहाँ चुप रहना एक भाषा है

ऑस्ट्रेलिया के आदिवासी समाजों में मौन खालीपन नहीं, ज़मीन है।

अरेर्न्ते और पिचंचाचारा जैसे समुदायों में किसी नए व्यक्ति से मिलते ही बोलना शुरू कर देना अशिष्टता मानी जाती है। पहले साथ बैठा जाता है, चुप रहा जाता है। यह प्रतीक्षा सामने वाले के होने के लिए जगह बनाना है — उसे जान लेना नहीं, उसे जगह देना।

शोक के दिनों में यह मौन हफ़्तों तक खिंच सकता है। जिन दुखों में शब्द चल ही नहीं पाते, वहाँ मौन अकेली ईमानदार भाषा बन जाता है।

इस परंपरा का एक नाम भी है: “दादिर्री”। उत्तरी ऑस्ट्रेलिया के न्गानगिकुरुंगुर लोगों से आए इस विचार को बुज़ुर्ग विदुषी मिरियम-रोज़ उन्गुनमेर-बाउमन ने दुनिया से परिचित कराया। अर्थ है — भीतरी गहरा सुनना और शांत, ठहरी हुई सजगता।

उनके शब्दों में: “दादिर्री जब जिया जाता है, तो आदमी फिर से पूरा हो जाता है। मैं नदी किनारे बैठ सकती हूँ; भले ही मेरा कोई अपना गुज़र गया हो, इस मौन सजगता में मुझे मेरा चैन मिल जाता है।”

यह सुनकर और चुप रहकर आने वाला उपचार है।

इस मौन का ज़मीन से भी गहरा रिश्ता है। आदिवासी परंपरा में “कंट्री” — यानी वह भूमि जिससे आप जुड़े हैं — एक जीवित सत्ता है, और उसे सिर्फ़ चुप रहकर सुना जा सकता है।

कोई बुज़ुर्ग मिट्टी पर बैठकर हवा, पक्षियों और पानी की आवाज़ सुनता है, तो दरअसल वह अपने पुरखों की आवाज़ सुन रहा होता है।

मौन यहाँ भीतर सिमट जाना नहीं है। ठीक उल्टा — दुनिया की तरफ़ आख़िर तक खुल जाना है। बोलना ध्यान को अपनी ओर खींचता है; चुप रहना आपको चारों ओर की हर चीज़ से जोड़ देता है।

आधुनिक आदमी मौन को “वह पल जब कुछ नहीं हो रहा” समझता है।

आदिवासी के लिए मौन वह अकेला पल है जब सब कुछ सुना जा सकता है।

एक बात ख़ास तौर पर चौंकाती है: दादिर्री न चिकित्सा है, न दवा, न कोई तकनीक। यह होने का एक ढंग है।

पश्चिम आज “माइंडफुलनेस” को अरबों डॉलर का उद्योग बना चुका है, जबकि ये पुराने समाज उसी मौन सजगता को हज़ारों साल से रोज़मर्रा की बुनावट में लिए चल रहे हैं। जिसे हम दोबारा खोजा हुआ मानते हैं, उसे उन्होंने कभी खोया ही नहीं। और हमें उसे एक ऐप में, एक कोर्स में, एक शुल्क वाले कार्यक्रम में बदलना पड़ा — क्योंकि हमें लगता है कि खोई हुई चीज़ सिर्फ़ खरीदकर वापस मिलती है।

मौन को अनुशासन मानने और उसे सेवा की तरह बेचने के बीच का फ़ासला बहुत पुराना नहीं है। गांधी अपने जीवन के आख़िरी दशकों में हर सोमवार मौन रखते थे। उस दिन भी काम रुकता नहीं था, बस पर्चियों पर लिखकर चलता था। मौन वहाँ दुनिया से ली गई छुट्टी नहीं था; दुनिया में रहने का दूसरा ढंग था।

जिस दुनिया ने खालीपन को दुश्मन घोषित किया

प्रबोधन के बाद के पश्चिमी संसार ने मौन को एक समस्या की तरह देखा।

अठारहवीं सदी की सैलून संस्कृति में बिना रुके चलती बातचीत एक गुण थी। फिर बारी-बारी से रेडियो, टेलीविज़न और इंटरनेट आए।

आज मॉल में पृष्ठभूमि संगीत बजता है, लिफ़्ट में बजता है, जिम में बजता है। मौन जैसे कोई दुश्मन हो, जिससे वास्तुकला को लड़ना है।

फिर भी पश्चिम कभी पूरी तरह एक-आवाज़ नहीं हुआ। उसी सभ्यता के बीचोंबीच मठों ने सदियों तक मौन को पवित्र माना। ट्रैपिस्ट भिक्षु आज भी हर रात “महामौन” में उतरते हैं। संध्या प्रार्थना से अगली सुबह तक एक शब्द नहीं बोला जाता, क्योंकि माना जाता है कि ईश्वर सिर्फ़ चुप मन में सुनाई देता है।

पश्चिम ने मौन को गली से भगाया, पर उसे मठ की दीवारों के पीछे छिपाकर रखा। शायद जो खोया वह मौन नहीं था, उसके लिए रखी गई जगह थी।

अगर कोई संस्कृति मौन से बचने के लिए पूरी तकनीक और कई उद्योग खड़े कर लेती है, तो असल में उसका मौन से झगड़ा चल रहा है। खालीपन को भरना पड़ना सुविधा नहीं, बेचैनी है। और वह बेचैनी इतनी सामान्य हो चुकी है कि अब हमें दिखती ही नहीं।

आज इस बेचैनी के नाम भी हैं। फ़ोन देखे बिना न रह पाना। एक पल खाली मिलते ही किसी स्क्रीन की तरफ़ हाथ बढ़ जाना। चुप्पी उतरते ही भीतर एक कसमसाहट का उठना।

ध्यान की अर्थव्यवस्था नाम का पूरा उद्योग इसी खालीपन के डर पर खड़ा हुआ है। हर नोटिफ़िकेशन, हर अपने-आप चल पड़ता वीडियो, मौन के लिए बची हर जगह को भरने के लिए बनाया गया है। क्योंकि जिस पल हम चुप होते हैं, सोचने लगते हैं; और जिस पल सोचते हैं, सवाल करने लगते हैं। शायद आधुनिक दुनिया का असली डर यही है: मौन आदमी को अपने ही साथ अकेला छोड़ देता है, और अक्सर यही वह मुलाक़ात है जिससे हम सबसे ज़्यादा भागते हैं।

आदमी कभी-कभी अपनी जानी हुई बात भूल जाता है। सत्रहवीं सदी में गणितज्ञ और भौतिकशास्त्री पास्कल ने लिखा था: “मनुष्य की सारी मुसीबतें इसी से आती हैं कि वह एक कमरे में अकेले चुपचाप बैठना नहीं जानता।” पास्कल तभी देख चुके थे कि आदमी अपने ही मन के साथ रह पाने से भागता है। ध्यान की अर्थव्यवस्था ने इस पुराने पलायन को ईजाद नहीं किया, बस उसका औद्योगीकरण कर दिया।

इन दो रास्तों का अलग हो जाना संयोग नहीं है। पश्चिमी प्रबोधन ने घोषित किया कि मानव बुद्धि ब्रह्मांड के हर कोने को परिभाषित कर सकती है। जो परिभाषित न हो, वह या तो अधूरा है या ख़तरनाक। मौन परिभाषित नहीं होता, इसलिए उसे भर दिया जाना चाहिए।

हर परंपरा ने अपरिभाष्य को कमी नहीं माना। उपनिषदों में अंतिम सत्य तक जाने का रास्ता ही निषेध से बना है — नेति नेति, यह नहीं, यह भी नहीं। जो कहा नहीं जा सका, वह वहाँ खाली जगह नहीं थी; वही सबसे भरी हुई जगह थी।

आदिवासी ब्रह्मांड-दृष्टि ठीक उल्टे सिरे से शुरू होती है। ब्रह्मांड पहले से अर्थ से भरा हुआ है; आदमी का काम अर्थ पैदा करना नहीं, उसे कान देना है। और मौन इसी सुनने को संभव बनाता है।

पिछले दिनों यूट्यूब पर एक अजीब चलन दिखा। दुनिया के सबसे शांत कमरे में जाकर बनाया गया एक वीडियो चला। दस दिन बाद कोई दूसरा वहीं पहुँच गया। फिर तीसरा। मतलब मौन भी व्यू और लाइक बटोरता है। हर पंद्रह दिन में आता एक शून्य-डेसिबल कमरा हमें याद दिलाता रहता है कि कमी असल में किस चीज़ की है।

शायद असली सवाल यह है: कोई संस्कृति मौन से डरना कब शुरू करती है? और जब वह उस डर को एक उद्योग में बदल देती है, तो जो आवाज़ उसने कमाई, उसके नीचे उसने क्या खोया — यह उसे कौन याद दिलाएगा?

S.K.C. द्वारा 27 जुलाई 2026 को वियना में लिखा गया।
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